बुधवार, 20 अगस्त 2008

कविता



विजय किशोर मानव

पीठ और चेहरा

लगती है गुमसुम, दुखी सी
कुर्सी से उतरकर जाते हुए
राजा की पीठ
चेहरे की ही तरह
कोई फर्क नहीं बचता
चेहरे और पीठ की नक्‍़काशी में
इस हद तक पथरा जाता है वजूद

ऊंचे सिंहासन से
उतरता है
अनगिनत सीढि़यां
कांपती पिंडलियों से
थका सा चल देता है
अंधेरे की तरफ
लम्‍बे गलियारे में
रोशनी से
रोशनी खत्‍म होने की हद के उस तरफ
दिखती है पीठ राजा की
पढ़ती है आंखें बेशुमार
उसका पूरा युग उसकी पीठ पर दर्ज
शमशान दर्शन की तर्ज पर बोलते रहते हैं
होंठ हज़ारों

अंधेरे में डूब जाने के बाद
एक पीठ/ समूचा वजूद
रोशनी दिखती है आती हुई
गर्वीली सी
आजू-बाजू बजते हैं कोर्निश
बिजली की तेज़ी से
लांघ जाती है बहुत सारी सीढि़यां

एक शह
सिंहासन पर फिर होता है एक चेहरा
फिर होता है फर्क चेहरे और पीठ में

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