सोमवार, 23 जुलाई 2012

गोपाल कृष्ण सक्सेना 'पंकज'/शिव लगे , सुंदर लगे ,सच्ची लगे

शिव लगे , सुंदर लगे ,सच्ची लगे
बात कुछ ऐसी कहो अच्छी लगे
मुद्दतों से मयक़दे में बंद है
अब ग़ज़ल के जिस्म पर मट्टी लगे
याद माँ की उँगलियों की हर सुबह
बाल में फिरती हुई कंघी लगे
जुल्फ़ के झुरमट में बिंदिया आपकी
आदिवासी गाँव की बच्ची लगे
रक़्स करती देह उनकी ख़्वाब में
तैरती डल झील में कश्ती लगे
ज़िंदगी अपने समय के कुंभ में
भीड़ में खोई हुई लड़की लगे
जिस्म "पंकज" का हुआ खंडहर मगर
आँख में ब्रज भूमि की मस्ती लगे

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