मंगलवार, 17 जुलाई 2012

...और बाड़ बन गई/सुधा ओम ढींगरा

''साथ वाले घर के सामने सामान ढोने वाला ट्रक खड़ा है। लगता है नए पड़ोसी आ गए हैं।" घर में प्रवेश करते ही मनु ने कहा।

यह सुनते ही मेरी उनींदी आँखें पूरी तरह से खुल गईं। मैं रसोई में सुबह की चाय बना रही थी और पूरी तरह से सचेत नहीं हुई थी। सुबह जब तक मैं एक प्याला चाय का ना पी लूँ, चुस्त-दुरुस्त नहीं हो पाती।
''क्या आप ने उन्हें देखा है ?'' उँगलियों के अग्रिम पोरों से आँखों को मलते हुए मैंने पूछा।
''नहीं सिर्फ सामान ढोने वाले श्रमिक देखें हैं।'' अखबार को पालीथिन के कवर से बाहर निकालते हुए मनु ने कहा और पालीथिन को कचरा डालने वाले डिब्बे में डाल दिया।
सुबह उठते ही वे बाहर से अखबार उठाने चले जाते हैं और मैं रसोई में चाय बनाने। अमेरिका में अखबार भी कितने सलीके से ढका होता है ताकि बरसात का पानी उसके काग़ज़ों पर असर ना डाल सकें। अखबार को थामे प्रांगण की ओर बढ़ते हुए मनु बोले -- ''पारुल, आज चाय बाहर ही ले आना। मौसम बहुत सुहावना है। हवा में घुटन और तल्ख़ी नहीं है। वह हल्के से धीरे-धीरे बह कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है। गर्मियों में ऐसी सुबह के लिए हम तरस जाते हैं।''
जून माह अपने आरंभिक दौर में है। हमारे शहर सेनफोर्ड की गर्मी और सर्दी अमेरिका के अन्य शहरों से भिन्न होती है। हर ऋतु में ऐसा लगता है कि भारत में बैठे हैं सिर्फ पतझड़ को छोड़ कर। पतझड़ से कुछ सप्ताह पहले वृक्षों के पत्ते कई तरह के रंग बदलते हैं। यहाँ गर्मियों में वातावरण में बहुत नमी होती है। अक्सर रात भर तड़पती पवन सुबह भी घुट -घुट कर साँस लेती है। कल रात तापमान कुछ कम हुआ था। आज की सुबह शीतलता ले कर आई है, जान कर अच्छा लगा। मैंने फटा-फट चाय बनाई और बिस्कुट ले कर बाहर आहाते में चली गई। वातावरण में घुटन तो है। पर वह महसूस नहीं हो रही। पड़ोसी कौन है ? कैसा है ? इसका कौतुहल अधिक है।
मेरी तरह मनु भी चाय पीते हुए साथ वाले घर की तरफ अधिक देख रहे हैं। हमारे प्रांगण से हमारी बगल वाले १०४ नम्बर घर का पिछवाड़ा, भीतर के कुछ कमरे, रसोई, उसके साथ लगा सनरूम नज़र आते हैं। हलचल बहुत है। सामान ढोने वाले काम कर रहे हैं। वे कभी सोफा और कभी कुर्सियाँ ला रहे हैं। घर का प्रवेश द्वार छोटा है और पीछे का दरवाज़ा बड़ा। वे सारा सामान पिछले दरवाज़े से भीतर ले जा रहे हैं। हम दोनों जहाँ बैठें हैं, हमारे पास से ही निकल कर जाते हैं। वह घर कुछ इस तरह से तिरछा बना है कि उस घर का पिछला भाग हमारे आहाते की हद तक आता है। पड़ोस के पिछवाड़े में कोई बगीचा नहीं, बस बड़ा बरामदा है । हमारे बाग़ की हरियाली ही साथ वाले घर की खिड़कियों से दिखाई देती है। मज़दूरों को निर्देश देने वाला कोई भी व्यक्ति नज़र नहीं आ रहा। हम दोनों के भीतर उत्सुकता बहुत बढ़ गई है। साथ वाले घर का मालिक कौन है ?
''एक प्याला चाय और पी जाए। माहौल बहुत ही बढ़िया है " मनु ने मेरी ओर देखते हुए कहा। माहौल और मौसम तो बहाना है बाहर बैठ कर चाय पीने का। दरअसल मैं भी नए पड़ोसी को देखे बिना वहाँ से उठना नहीं चाहती थी। मैं चाय के बर्तन उठा कर रसोई में फिर से चाय बनाने चली आई। चाय का पानी केतली में डाल कर गैस पर रख ही रही थी कि मनु की आवाज़ कानों में पड़ी। वे किसी से बातें कर रहे हैं। मैं सब कुछ छोड़ कर बाहर की ओर तेज़ी से चल दी, लगा नए पड़ोसी से बात कर रहे हैं। अरे मनु तो दाईं तरफ १०० नम्बर वाले घर की ज़ीवा के साथ बतिया रहे हैं। वह कॉफ़ी , कुकीज़ और अखबार ले कर अपने आँगन में उसी घर की तरफ मुँह करके बैठ गई है, जिसे कुछ देर पहले हम देख रहे थे। जब से यह घर सेल पर आया था। ज़ीवा बेताब थी। कितने का घर बिक रहा है और कौन -कौन देखने आ रहा है, सारी जानकारी मुझ से लेना चाहती थी। सोचती थी कि मेरा घर बगल में हैं और मुझे सारी ख़बर होगी जैसे हर आने जाने- वाले को मैं देखती रहती हूँ। उसका घर थोड़ी दूर पड़ता है। कई बार उसे कहा भी ---'' ज़ीवा मुझ से क्यों पूछती हो ? विक्रय की तख्ती पर कर्मक का मोबाईल नंबर है, कार्यालय का फ़ोन नंबर है। किसी को भी फ़ोन कर के पता कर लो ।'' ज्योंही ज़ीवा को पता चला कि घर बिक गया है ..... तो कौन आ रहा है उस घर में ? यह जानने की उसकी जिज्ञासा चरमसीमा तक पहुँच गई। मकान मालिक का पता नहीं चला उसे। तब से बेचैन घूम रही है।
हम भी तो उसी तरह बेचैन हैं, सोच कर मुस्करा पड़ी मैं और रसोई में लौट आई। पानी खौल रहा था। इलाइची और दालचीनी पीस कर पानी में डाली। चाय पत्ती, दूध डाल कर चाय बनाई। बाहर जा कर बैठी ही थी कि ज़ीवा को अखबार सामने रख कर फिर वहीं देखते पाया। नए पड़ोसी कहीं नज़र नहीं आ रहे। बस मज़दूर इधर- उधर घूम रहे हैं।
'' लगता है, पुरानी गृहस्थी है , कितना सामान है।'' मनु मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं देते और ख़ामोशी से चाय पीते हुए कनखियों से उस घर की ओर देखते रहते हैं।
शनिवार का दिन है यानि छुट्टी। बाकि दिनों की अपेक्षा इस दिन दिनचर्या बहुत धीमी गति से चलती है। सिर्फ चाय की गति तेज़ है, तीन प्याले पी चुके हैं हम। जिनको देखने के लिए पी रहे हैं, वे नज़र नहीं आ रहे। वहाँ से उठने का मन नहीं कर रहा। वृक्षों की ओट से निकल कर सूर्य अब हमारे सामने आ खड़ा हुआ है। उठना मजबूरी हो गई है। तापमान बढ़ना शुरू हो गया है। ज़ीवा भी अपना सामान उठा कर अपने घर के भीतर चली गई।
सारे घरों के अग्रिम भाग और पिछवाड़ों के आहातों की हदें आपस में मिलीं हुई हैं। एक तरफ के ड्राईवे कुछ दूरी तक घरों को अलग करते हैं बाद में सब के आहाते आपस में मिल जाते हैं। कहीं कोई बाड़ नहीं।
भारत में चारदीवारी बनाना आम बात है। घरों के इर्द- गिर्द ऊँचीं दीवारें और लोहे के बड़े -बड़े गेट बनवाने का चलन है। इससे लोगों की निजता की रक्षा होती है और बाहरी ख़तरों, चोरों आदि से भी सुरक्षा मिलती है। अमेरिका में चालीस -पचास वर्ष पहले लोग लकड़ी या लोहे की बाड़ घरों के पिछवाड़ों में बनाते थे। चारदीवारी बनाने का कोई रिवाज़ नहीं था। घर के आगे अहाता खुला ही होता था, वहाँ किसी तरह की कोई बाड़ नहीं बनाई जाती थी। जब से परिवार और समुदाय की भावना अमेरिका के लोगों में बढ़ी है, पिछवाड़े से बाड़ भी परगनों से समाप्त हो गई है। अब बाड़ के बिना घरों वाले एरिया को प्रमुखता दी जाती है। अमेरिकेंज़ सोचते हैं कि इस तरह के परगना में रहने से बच्चों में समुदाय की भावना आती है। पड़ोसियों के महत्त्व को समझा और महसूस किया जा सकता है। हमारे घरों के प्रतिवेश की भी यही विशेषता है।
इसी भावना के अंतर्गत हमने यहाँ ज़मीन ले कर घर बनवाया था। १०२ नंबर का हमारा घर बन चुका था और हम तक़रीबन घर में स्थापित हो गए थे, जब साथ वाला १०४ नम्बर का घर बन कर पूरा होते -होते बिक गया था।
उस दिन डोर बेल झनझना उठी थी। दरवाज़ा खोला तो सामने एक दक्षिण भारतीय दंपत्ति खड़ा था। रमेश एवं चित्रा महालिंगम कह कर उन्होंने अपना परिचय कराया था। हमारे पड़ोसी थे। पहचानने में देर ना लगी। बिल्डर ने उनके बारे में बताया था, उन्होंने ही १०४ नम्बर वाला घर ख़रीदा था। वे हमसे मिलने आए थे। अमेरिका में भारतीय का पड़ोसी होना वरदान लगा था। मनु की नौकरी के सिलसिले में अमेरिका के बहुत से शहर देखे हैं। हर स्थान पर अच्छे पड़ोसी मिले। सब अमेरिकंज़ थे। करीब जा कर भी कहीं ना कहीं उनमें औपचारिकता रहती है। अपनत्व की कमी खलती है हालाँकि दुःख- सुख के वे बहुत भागीदार होते हैं। हमेशा परिकल्पना करती थी कि अगर भारतीय पड़ोसी हो तो पड़ोस का सुख कैसा होगा ? वह सुख लेना चाहती थी, उन अनुभवों को जीना चाहती थी। मुझे उस का मौका मिल गया था। पहले दिन से ही चित्रा और रमेश के स्वभाव ने हमारा दिल जीत लिया था। कुछ दिनों के भीतर ही उनके दो बच्चे, हमारे दो बच्चे और ज़ीवा का बेटा आपस में खेलने लगे। कभी घर के पिछवाड़े में और कभी घरों के सामने सड़क पर। ज़ीवा का घर हमसे कुछ महीने पहले बना था।
हमारे प्रतिवेश का एक ही गेट है। सारे घरों की सड़कें गोल चक्कर खा कर बन्द हो जाती हैं। जिन्हें कल-डी-सैक कहते हैं। हमारे घर भी उसी पर हैं। बच्चों का सड़कों पर खेलना सुरक्षित होता है। तीनों घरों में बच्चे धमाचौकड़ी मचाते। परगना के बच्चे भी हमारे यहाँ पर आकर हमारे बच्चों के साथ खेलने लगे थे। स्कूल के बाद बच्चों के शोर से वातावरण गुंजाएमान रहता। बच्चों के साथ -साथ हम तीनों परिवार भी करीब आ गए थे।
ज़ीवा यहूदी मूल की अमेरिकन है। संयुक्त परिवार में बहुत विश्वास करती है। जीवन मूल्य, परम्पराओं , अनुशासन और उसका बच्चों को पालने का तरीका हमसे बहुत मेल खाता है। हमारा उसके करीब जाना स्वाभाविक था। दस वर्ष हम तीनों परिवारों और बच्चों ने इकट्ठे बिताए। वह हमारी दिवाली और होली पर साड़ी पहन कर आती है और हम उनके रोश हशामः में सज- धज कर जाते हैं। समय की रफ्तार तेज़ है, इसका एहसास हमें तब हुआ जब बच्चे दूसरे शहरों के विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए चले गए। तीनों परिवार ऐसे खाली घोंसलों की तरह हो गए। दुःख- सुख बांटते हम जीवन का आन्नद ले रहे थे कि अचानक एक दिन चित्रा ने बताया, उनकी कम्पनी ने तरक्की देकर उन्हें वर्जिनिया जाने का आदेश दे दिया है। कम्पनी यहाँ का उनका घर बिकवाएगी और वर्जिनिया में घर खरीदवा भी देगी। सुन कर ख़ुशी हुई। अमेरिका की गिरती अर्थव्यवस्था में उन्हें नौकरी में अच्छा सुअवसर मिल रहा था। पर झटका भी लगा। वर्षों का साथ छूट रहा था। दिल को समझा लिया। अमेरिका की जीवन शैली में यह आम बात है। दोस्ती कहीं जाएगी थोड़े ही। हाँ रोज़ का मिलना कम हो जायेगा।
घर बेचने वाली एजेंसी ने चित्रा-रमेश का घर बिक्री पर लगा दिया। बावजूद अमेरिका की आर्थिक मंदी के दो सप्ताह के भीतर ही उनका घर बिक गया। पर किसने ख़रीदा, बहुत गोपनीय रखा गया। मनु का विचार था कि आर्थिक मंदी के समय में किसी भारतीय ने ख़रीदा होगा और बैंक से लिए गए कर्ज़े की स्वीकृति और उसकी औपचारिकता तक ही इसे गोपनीय रखा गया है। अमेरिका में भारतीय बहुत समृद्ध हैं। इस देश के आर्थिक उतार-चढ़ाव से उन को कोई अन्तर नहीं पड़ता। ज़ीवा सोचती थी, किसी यहूदी ने ख़रीदा होगा। वे भी भारत के पटेल और मारवाड़ियों जैसे व्यापारी होते हैं, सही समय और सही जगह पर तोल-भाव करने वाले। अमेरिका की आर्थिक गिरावट ने घरों की कीमतें बहुत कम कर दी हैं। निवेश करने वाले आज कल रियल एस्टेट में खूब धन लगा रहे हैं। खैर बहुत कुछ सोचते रहे पर हमें साथ वाले घर के गृह-स्वामी का पता नहीं चला।
किसी ने दरवाज़ा खटखटाया। मैं और मनु दरवाज़े की ओर लपके। सोचा नए पड़ोसी होंगे। ज़ीवा खड़ी थी।
''रुबिन ने बाहर ग्रिल पर खाना बनाया है। आप के रॉक गार्डन में दोपहर के भोजन का सामान रख दिया है। वहाँ वृक्षों की ओट में बहुत छाया है। गर्मीं महसूस नहीं होगी। आ जाओ। छुट्टी का मज़ा लें।''
दरवाज़ा उड़का कर हम रॉक गार्डन की ओर चल दिये। मैं ज़ीवा की मंशा जान गई थी। वहाँ बैठ कर वह साथ वाले घर की हलचल, ड्राईवे और घर के अग्रिम भाग को देखना चाहती है। सामान ढोने वाले आँगन का फर्नीचर ले कर जा रहे है। तभी दो कुत्ते और तीन बिल्लियाँ उनके पीछे भागे। हमें देख कर कुत्ते भौंकने लगे और बिल्लियाँ मियाँऊँ-मियाँऊँ करने लगीं। कुछ देर तक वे हमारा मनोरंजन करते रहे फिर मज़दूरों के पीछे भाग गए।
''पारुल, ये लोग तो बाड़ बनाएँगे। दो कुत्ते और तीन बिल्लियों को कैसे अपनी हद में रखेंगे।'' ज़ीवा ने चिंतित हो कर कहा।
''कहाँ लगाएँगे ? जगह ही कहाँ है ? हमारी सीमा को पार करके ही लगानी पड़ेगी और हमारे प्रतिवेश के कानून उसकी आज्ञा नहीं देंगें। ग्रिल वाली बाड़ अब कोई लगवाता नहीं। अदृश्य लगवायेंगें तो क्या फर्क पड़ता है।'' मैंने लापरवाही में कहा।
''अजीब लोग हैं अभी तक नज़र ही नहीं आए।'' रुबिन ने कहा।
सामने की सड़क के दूसरी तरफ के घरों में मार्गरेट भी अपने घर के आगे बरामदे में कुर्सी डाल कर अधलेटी इधर ही देख रही थी। हाथ हिला कर हमने अभिवादन किया।
जीवा के चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसके स्वाभिमान को बहुत चोट लगी है। उसे अभी तक पता नहीं चल पाया कि चित्रा- रमेश के घर में कौन आया है ? उसे वेस्टर्न एस्टेट्स (हमारे परगना का नाम) का मुफ्त का समाचार पत्र कहते हैं। जिसे हर घर की, हर ख़बर होती है।
ज़ीवा किसी को फ़ोन करने लगी और हमारा ध्यान एक दम सड़क की ओर चला गया। दो बड़ी काली वैन आकर रुकीं और उसमें से कुछ मैक्सिकन निकले। कामगार लग रहे थे। वे वैन में से सामान निकाल कर घर के भीतर ले जाने लगे। तभी फ़ोन से हट कर ज़ीवा ने रहस्योदघाटन किया कि किसी माफिया के मुखिया ने घर लिया है।
''सच" हम तीनों के मुँह से निकला।
''हाँ, नहीं तो इतनी गोपनीयता की क्या बात है? नैंसी से बात हो रही थी। वह बता रही थी कि स्वागत मंडल की अध्यक्ष होने के नाते, हमारे प्रतिवेश और पड़ोसी वर्ग की तरफ से नए पड़ोसियों का स्वागत करने फूलों का गुलदस्ता, कुकीज़ और स्वागतीय कार्ड लेकर गई थी पर दरवाज़े पर कोई नहीं आया। बस बाहर से ही काम करने वालों को सब कुछ दे कर चली आई।"
''ज़ीवा हो सकता है कि अभी मकान मालिक आए ना हों।'' मनु बोले। रुबिन ने भी 'हाँ' कह कर साथ दिया।
''काम करने वाले इतने क़रीने से और हर चीज़ स्थान पर कैसे रख रहे हैं ! कोई तो अंदर बैठा उन्हें निर्देश दे रहा है... और इतने ज़्यादा लोग काम करने वाले। हम सब ने एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरण किया है, मूवर्ज़ कभी ऐसा काम करते हैं ?'' ज़ीवा ने अपना तर्क दिया।
सूर्य कहर बरपाने की मुद्रा में आ गया था। हम पसीने से तर- बतर हो रहे थे पर प्रसंग और जिज्ञासा उठने नहीं दे रही थी। गृह सज्जा विशेषज्ञ की चमचमाती मर्सेडीज़ आ कर रुकी। साथ ही खिड़कियों पर पर्दे और ब्लाईंडज़ लगाने वाले की कार। हम चुपचाप वहाँ से उठ गए, ज़ीवा की बात सही लगी।
घर में बाहर से अधिक उमस महसूस हुई। शायद भीतर यह डर बैठ गया था कि अगर पड़ोसी माफिया का मुखिया निकला तो?
मैं बार -बार खिड़की के पास जा कर उस घर को देखती हूँ। चैन उड़ गया है। खिड़कियों- दरवाज़ों पर ब्लाईंड लगने शुरू हो गए हैं।
''मनु इसका मतलब है कि दरवाज़े -खिड़कियों को पहले से ही नाप लिया गया था, तभी तो आज उन पर सब कुछ लगाया जा रहा है। पर इतनी जल्दी यह सब कैसे किया जा सकता है ? दो सप्ताह पहले ही तो घर बेचने के लिए रखा गया था।''
''शायद अथाह पैसा हो। प्राथमिकता पर काम करवा रहे हों। पैसा खर्चो तो क्या नहीं हो सकता। '' मनु ने बात समाप्त करते हुए कहा।
''मनु यह भारत नहीं है, अमेरिका है। नाप पर जो सामान बनता है, उसे समय लगता है।'' समझने की कोशिश में मैं कई बार खिड़की के पास गई। वहाँ से अब कुछ दिखाई नहीं दे रहा। हमारी तरफ की खिड़कियों को ब्लाईंडज़ से बंद कर पर्दों से ढक दिया गया है।
''इतनी पर्दादारी किस लिए ? ''मनु कुछ नहीं बोलते। मैं चिढ़ जाती हूँ। टी.वी लगाती हूँ। कौन बनेगा करोड़पति आ रहा है। कुछ देर देखती हूँ। वहाँ से उठ जाती हूँ। मन कहीं भी स्थिर नहीं हो रहा। एक अजीब सा सूनापन भीतर- बाहर महसूस हो रहा है। चित्रा- रमेश की कमी खल रही है।
''ऐसे पड़ोसी से क्या सुख मिलेगा ? जिसके आने से पहले ही बेचैनी हो गई। '' सोचते हुए फिर खिड़की के पास खड़ी हो जाती हूँ। इस खिड़की से साथ वाले घर का अग्रिम भाग नज़र आ रहा है। सारे घर की बत्तियाँ जल गईं हैं। खिड़कियाँ - दरवाज़ों को पूरी तरह से ढक दिया गया है, रौशनी फिर भी छन कर बाहर आ रही है। कई लोगों के हँसने की आवाज़ आई। उनका घर और हमारा घर बंद होने पर भी भीनीं - भीनीं सी आवाज़ हमारे तक पहुँची। इसका मतलब बड़ा परिवार है। मनु भी अपनी किताब छोड़ कर मेरे साथ आ कर खड़े हो जाते हैं। साथ वाले घर में अब कोई नहीं बोल रहा। हँसते-हँसते सब चुप हो गए हैं। कौन सी भाषा वे बोल रहे थे उसका पता नहीं चला। मन उचाट हो गया। बोरियत ने घेर लिया। मैं सोने चली जाती हूँ। थोड़ी देर बाद मनु भी सोने के लिए आ जाते है।
दोनों के मन में एक ही भाव धूम रहा है कि इतने गोपनीय पड़ोसी कौन हैं ?
रविवार की सुबह प्रतिदिन की अपेक्षा हम देर से उठते हैं। पूरे सप्ताह की थकान दूर करने के लिए एक ही दिन मिलता है। पर आज तो फ़ोन की लहराती स्वर लहरी ने उठा दिया। बिस्तर पर अलसाये से मनु बोले --''पारू यार, लोग क्यों भूल जाते हैं कि आज इतवार है ?'' मेरा भी उठने का मन नहीं था। संदेश मशीन पर सन्देश शुरू होने दिया। ज़ीवा बोल रही थी --''उठो, आज सोने का दिन नहीं है। देखो, बाहर क्या हो रहा है। "हम ने उसके सन्देश पर ध्यान नहीं दिया और बिस्तर पर करवट बदल कर सोने की चेष्टा करने लगे। उसका सन्देश कानों में गूँजता रहा, बाहर की जिज्ञासा बनी रही। हम करवटें बदल-बदल कर सोने की कोशिश में आलसय से लिप्त बिस्तर पर लोटते रहे।
तभी फिर फ़ोन की घंटी बजी, कानों के पर्दे फाड़ती महसूस हुई। ज़ीवा की आवाज़ थी--''अरे आलसियों! उठो। रॉक गार्डन में चाय नाश्ता लगा दिया है। देखो बाहर बाड़ बन रही है।''
''बाड़'' शब्द ने शरीर में स्फूर्ति भर दी। हम बिस्तर से उठ कर सीधे शौचालय की ओर भागे। ज़ीवा और रुबिन पड़ोसी नहीं घर के सदस्यों की तरह हो गए हैं। दोनों परिवारों ने एक दूसरे को काफी अधिकार दिये हुए हैं। छुट्टी वाले दिन हम एक दूसरे को लंच या डिनर खिला कर ख़ुशी महसूस करते हैं। 'बाड़' के बारे में सोचते-सोचते मैं तैयार होने लगी।
दस मिनट में तैयार हो कर हम घर के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकले। बरामदे से रॉक गार्डन की ओर जाते हुए हमने देखा नेचर्ज़ क्रिएशन नर्सरी का बहुत बड़ा ट्रक खड़ा है और उसके कामगार फुर्ती से बड़े-बड़े गमले जिनमें मध्यम कद वाले फाइकस के वृक्ष लगे हुए थे, साथ वाले घर की हद के भीतर कतार में दस-दस फुट की दूरी पर रख रहे थे। हमारी तरफ से ड्राईवे पर बाड़ बना दी गई थी और आहाते की तरफ काम जारी है। एक जैसे गमले और एक जैसे वृक्ष।
दृश्य देख कर स्तब्ध रह गए। इतनी जल्दी कैसे सब इंतजाम किया? नए पड़ोसी की चालाकी और बुद्धिमत्ता को दाद देने को मन किया। हमारे परगना की नियमावली अनुसार आप को बाड़ बनाने के लिए बकायदा हमारे सब-डवीज़न के निर्देशक मंडल से लिखित अनुमति लेनी पड़ती है, वह भी पड़ोसियों की स्वीकृति के हस्ताक्षरित पत्र पर। यह मंडल चुनाव पद्धति से चुना गया होता है और बिना कारण के किसी भी तरह की बाड़ बनाने की इजाज़त नहीं देता। जिनके घरों में पालतू जानवर होते हैं, वे ग्रिल (लोहे की ) बाड़ की बजाए बिजली की अदृश्य बाड़ लगवाने लगे हैं। पालतू जानवर के गले में एक पट्टा सा बाँध दिया जाता है और जब वह उस बाड़ की सीमा रेखा के पास जाता है तो हल्का सा उसे झटका लगता है। उसे अपनी हद का पता चल जाता है और वह फिर आगे नहीं जाता। इस तरह से घरों की सुन्दरता नहीं बिगड़ती। अमेरिका में घरों की बाहरी सुन्दरता का बहुत ध्यान रखा जाता है। हाँ आप अपनी निजता के लिए अपने घर की सीमा में जितने चाहें पेड़, फूल -पौधे लगा लें। यही साथ वाले पड़ोसी ने किया। बाड़ भी बना ली और किसी कानून का उल्लंघन भी नहीं किया।
हम नाश्ते के लिए रॉक गार्डन में जा बैठे। ज़ीवा और रुबिन इंतज़ार कर रहे थे। मौन अभिवादन के बाद चाय, कॉफ़ी का प्याला और फ्रेंच टोस्ट पकड़ कर सब की आँखें बाड़ बनाने वालों पर ही स्थिर हो गईं।
''क्या दादागिरी है। साथ वाले अभी कल आए हैं। किसी से मिले नहीं, किसी ने उनकी सूरत नहीं देखी। पड़ोसियों से कोई आदान- प्रदान नहीं हुआ, वे अच्छे हैं या बुरे, जानने की कोशिश तक नहीं की और निजता के लिए बाड़ बनवा ली। '' ज़ीवा बड़े रोष से एक ही साँस में बोली।

''ज़ीवा मुझे तुम्हारी बात सही लगती है। माफिया का ही व्यक्ति है जिसे किसी की कोई परवाह नहीं।'' मैं भी गुस्से से बोली।

''पर ऐसे कैसे चलेगा ? कोई भी हो, पड़ोसियों से तो मिल- जुल कर चलना चाहिए। '' रुबिन ने कहा।

''कम्पनियों ने अपना पैसा बचाने के लिए जब से लोगों को घर से काम करने की इजाज़त दी है, लोग अन्तर्मुखी हो गए हैं। मिलना- जुलना कम हो गया है। अंतरजाल पर तो अनजानों से दोस्ती करेंगे और फेस बुक पर अपना भीतर-बाहर उड़ेल देंगे पर अपनों और पड़ोसियों से परे रहेंगे, उनके लिए समय नहीं। उनसे प्राईवेसी चाहिए।'' ज़ीवा रुष्टता से बोली।

''कम्पनियों को क्यों दोषी ठहराती हो? अंतरजाल ने लोगों को कम्प्यूटर से बाँध दिया है। हर चीज़ वहाँ उपलब्ध हो जाती है। लोग घर बैठे शौपिंग करने लगे हैं।'' रुबिन बोला।

''हाँ तभी तो समुदाय की भावना समाप्त होती जा रही है। अवसाद बड़ों के साथ -साथ युवा वर्ग को भी घेरने लगा है। दुःख -सुख में कंम्प्यूटर काम नहीं आता। अपने आते हैं, पड़ोसी आते हैं। लोग उन्हीं से दूर होते जा रहे हैं।'' ज़ीवा अपनी धुन में बोलती गई।



मैं दोनों की नोंक-झोंक सुनते हुए चाय पी रही थी। अभी तारो- ताज़ा नहीं हुई थी।

''बाड़ बनाने का कोई कारण तो हो, हमें सुबह उठ कर गमले देखने पड़ेंगे। पिछवाड़े का सारा प्राकृतिक दृश्य खराब कर दिया। ''मनु बुदबुदाये।

''कारण तो वे दे देंगे, दो कुत्ते, तीन बिल्लियाँ। " रुबिन ने कहा।

''फिर अदृश्य बाड़ बनवाते। वृक्षों और गमलों वाली क्यों ? '' मैं बिफर गई।



नेचर्ज़ क्रिएशन नर्सरी के मालिक अनिल गाँधी की कार हमारे ड्राईव के पास आ कर रुकी। हमें बाहर बैठे और बातें करते देख कर वह हमारे पास आ गया। हमारे कई घरों के अग्रिम भाग और पिछवाड़े की बागवानी अनिल ने की है और हमारा रॉक गार्डन भी उसी ने बनाया है।

''हेलो अनिल, तुम साथवाले घर के मालिक से मिले हो, कौन है वह ?'' मैंने उसके पास आते ही प्रश्न किया।

''मैं नहीं मिला, उसके प्रतिनिधि से ही बात हुई है।"

''प्रतिनिधि ! " हम तीनों के मुँह से निकला।

''हाँ, आप हैरान क्यों हुए ?'' अनिल ने पूछा।

बात को बदलते हुए मैंने कहा '' हैरानगी की बात तो है, इतनी जल्दी एक जैसे गमले और पेड़ तुमने कैसे इकट्ठे कर लिए ? अभी तो घर ख़रीदा है साथ वालों ने। ''

''जी जब कोई पैसा पानी की तरह बहाए तो कौन काम नहीं करेगा। उन्होंने अग्रिम राशि ही बहुत दे दी थी।''

हम चारों ने एक दूसरे की ओर देखा। सब के मन में एक ही भाव आया --माफिया।

''आप ऐसे क्यों देख रहे हैं ? कोई बात तो है। "

''अनिल गमलों को रखते समय तुम्हें हमारा ध्यान नहीं आया। सुन्दर प्राकृतिक दृश्य ख़राब कर दिया है।'' मैंने बात को टालते हुए गिला सा किया।
''मैडम, आपको बचा लिया है। ये लोग तो मैग्नोलिया अपनी सीमा में लगवाना चाहते थे। मुझे पता है कि एक दो सालों में मैग्नोलिया की जड़ें और पूरा का पूरा वृक्ष आप की हद में आ जाता।
आप व्यू तो लेतीं पर सारी उम्र कुढ़ती रहतीं। अच्छा मैं चलूँ , मिलूं नए पड़ोसी से बाकि पैसों का हिसाब करना है।''
''हमने तो अभी तक नए पड़ोसी को देखा नहीं, उसके बारे में कुछ पता भी नहीं चला। एक रहस्य बना हुआ है। '' ज़ीवा ने मुँह बिचकाते हुए कहा।

''सड़क पार वालों ने भी यही कहा है। मैं अभी राज़ जान कर आता हूँ। मेरे लिए भी चाय बना लें। सुबह से चाय नहीं पी।" अनिल घास फलांगता सा साथ वाले घर की तरफ चला गया।

ज़ीवा चाय, कॉफ़ी और नाश्ते के बर्तन इकट्ठे करने लगी।

''अनिल के लौट कर आने तक मैं बेगल और क्रीम चीज़ ले कर आता हूँ। मनु तुम मसाला चाय बना लाओ। " रुबिन ने बर्तन उठाते हुए कहा। मनु और रुबिन रॉक गार्डन को छोड़ अपने -अपने घरों की ओर बढ़ गए।
मैं और ज़ीवा वहीं कुर्सियों में ढीली -ढाली हो कर धँस गईं।

सामने वाले और सड़क पार के घरों के लोगों की जिज्ञासु आँखें काम करते हुए भी इधर साथ वाले घर पर ही टिकी हैं । किटी पर्ल फूलों को पानी देते हुए बार-बार बन रही बाड़ को देख रही है। डैनियल और मारग्रेट के बच्चे सड़क पर खेल रहे हैं, वे उनके साथ खेलते हुए, कई बार खड़े हो कर बाड़ को देखने लगते हैं।
रविवार के दिन हमारे परगना की मुख्य सड़क पर बहुत रौनक रहती है। हमारा रॉक गार्डन और साथ वाले घर का अग्रिम भाग मुख्य सड़क पर पड़ता है। सैर कर रहे दम्पत्ति और जॉगिंग कर रहे लोग बाड़ को देखने के लिए रुक जाते हैं।
मैं आकाश को देख रही हूँ। बादलों ने चक्रव्यूह बना कर आज दिनकर को घेर लिया है। एक किरण बाहर नहीं निकलने दे रहे। वह अभिमन्यु सा चक्रव्यूह में रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा है। बादल उसे पूरी तरह से ढक कर रोके हुए हैं। काले स्लेटी बादलों ने दिन को तक़रीबन गोधूली वेला में बदल दिया है। हवा घुट गई है। वृक्षों से बने छाते की ओट में बैठे हमारा दम घुटना शुरू हो गया। मनु एक खड़ा पंखा लगा गए हैं। उसकी हवा से थोड़ी राहत मिल रही है। बाड़ तेज़ी से बनती जा रही है। आस- पास के बगीचों की घास भी गर्मीं में तड़पती महसूस हो रही है सिर्फ कुछेक घरों की घास को छोड़ कर। डेमी और माईकल के यहाँ ज़ोईशिया घास लगी है, वह कड़कती गर्मीं में हरी होती है और सर्दियों में पीली। उसे पानी भी कम चाहिए होता है, बाकि सब के अहातों में घास प्यास से, गर्मीं से सूख रही है। घास को पानी दिया जा रहा है। स्प्रिंकलर चल रहे हैं..छुक-छुक .. शाँ..शाँ की आवाज़ बड़ी भली लग रही है। ज़ीवा और हमारे यहाँ भी स्प्रिंकलर चल पड़े हैं। उनकी हल्की -हल्की फुहारों से कुछ छींटें हम पर भी पड़ रहे हैं। बड़ा सुखद लग रहा है। डैनियल के बच्चे स्प्रिंकलर की फुहारों के साथ खेल रहे हैं, उसके छमाछम पानी में कूद रहे हैं।
उनका पानी में कूदना मुझे भारत अपने मायके के वेहड़े ( आँगन ) में ले गया। छम छम बरसात में भीगती, कूदती हुई नन्हीं बच्ची बन गई थी। पता नहीं चला, कब मनु और रुबिन आ गए। ज़ीवा के फ़ोन ने ध्यान तोड़ा। वह नैंसी से बातें कर रही थी ''बस थोड़ी ही देर में पता चल जायेगा कि कौन आया है इस घर में।''
अनिल को आते देख सब सचेत हो गए। ज़ीवा ने फ़ोन बंद कर दिया। अनिल चुप-चाप कुर्सी पर आकर बैठ गया। मनु ने चाय कप में डाल दी। रुबिन ने क्रीम चीज़ लगा बेगल उसके आगे बढ़ा दिया। बेगल का टुकड़ा मुँह में डालते हुए, चाय के घूँट के साथ वह बोला -'' मालिक से तो नहीं मिला। सेक्रेटरी किमर्ली ने हिसाब कर दिया है। बस इतना जान पाया हूँ कि भारतीय है और बहुत बड़ा व्यापारी है। घर पर कम रहता है। अधिकतर देश- विदेश घूमता रहता है। व्यक्तिगत और अन्तर्मुखी है। किसी से मिलना-जुलना पसंद नहीं करता। इसीलिए घर में आने से पहले अपनी निजता की सुरक्षा के लिए सिक्यूरिटी सिस्टम, ब्लाईंड, पर्दे और बाड़ लगवा रहा है। ''
''इतना ही व्यक्तिगत है तो परिवारों वाले इलाके में घर क्यों लिया ? किसी जंगल बियाबान में लेता तो प्राईवेसी ही होती। कितने लोग निजता ढूँढते उजाड़ पहाड़ों पर रहते हैं । चला जाता वहीं पर। हमारा पड़ोस क्यों खराब किया ? यहाँ क्या चोर- उच्चके रहते हैं जिनसे सुरक्षा चाहिए।'' मैं अपने भावों को रोक नहीं पाई और बरस पड़ी .....
''मैं कितनी उत्साहित थी कि अब अगर फिर भारतीय पड़ोसी मिला तो जीवन में दोबारा से रस आ जायेगा। विदेशी धरती पर देसी पड़ोसी, सोच कर ही भीतरी भावनाएँ तरंगित हो रहीं थीं। सारी उमंगों पर पानी फेर दिया। यह भारतीय तो अमेरिकी लोगों से भी दस कदम आगे निकला।''
मनु मेरे मन की व्यथा को समझ गए, सांत्वना देते हुए उन्होंने कहा '' पारुल कई भारतीय अमेरिकी लोगों को समझे बिना उनकी तरह बनने की कोशिश करते हैं, वे अमेरिकी बन नहीं पाते और भारतीय वे रहते नहीं। संभ्रमित हो कर रह जाते हैं। जो वे हैं नहीं वही बनने की कोशिश में सीमाओं का उल्लंघन कर जाते हैं। हमारा नया पड़ोसी भी उनमें से एक है।"

''परिवार तो है या वह भी नहीं।''

''इसका मुझे पता नहीं चला...
'' अनिल चाय समाप्त करता हुआ बोला।
इतने दिनों का गुप्त राज़ खुल गया, नया पड़ोसी माफ़िया सरगना नहीं भारतीय है। पर माफ़िया से भी अधिक रहस्यमयी निकला। भारतीय पड़ोसी हो इसकी चाह, मोह और स्वप्नों का संसार चूरमूर हो गया। वृक्ष से टूटी हुई टहनी सा लुंजपुंज महसूस कर रही हूँ मैं। वहाँ बैठना अब मुश्किल हो रहा है और..... हमारे देखते ही देखते बाड़ बन गई...



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