बुधवार, 18 जुलाई 2012

क़ैफ़ी आज़मी/मकान

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।

ये ज़मीं तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हमने ।
इन मकानों को खबर है न मकीनों को खबर
उन दिनों की जो गुफाओं में गुजारे हमने ।

हाथ ढलते गये सांचे में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नये नक्श निखारे हमने ।
की ये दीवार बलंद,  और बलंद,  और बलंद,
बाम-ओ-दर और जरा और सँवारे हमने ।

आँधियाँ तोड़ लिया करती थी शम्‍ओं की लवें
जड़ दिये इसलिये बिजली के सितारे हमने ।
बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे खाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिये ।

अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ए-पैहम की थकन
बंद आंखों में इसी कस्र की तस्‍वीर लिये ।
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक
रात आंखों में खटकती है सियह तीर लिये ।

आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।

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