मंगलवार, 17 जुलाई 2012

भेडिय़े : भुवनेश्‍वर

शाहजहाँपुर में जन्‍में भुवनेश्‍वर अपने युग के सर्वाधिक विवादास्‍पद लेकिन सशक्‍त कथाकार हैं। उनकी अद्भुत कहानी ‘भेडिये़’ और इस पर वरिष्‍ठ कथाकार प्रेमपाल शर्मा की टिप्‍पणी-
‘भेडिया या क्या है’,- खारू बंजारे ने कहा- ‘मैं अकेला पनेठी से एक भेडिय़ा मार सकता हूँ।’ मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालांकि 70 के आसपास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा-सा दिख पड़ता था, पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था। उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था, पर उसका लघुकरण ‘खारू’ बिल्कुल चस्पा होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आँखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूँछों के नीचे उसका मुँह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था जितना एक चूहेदान।
‘जीवन से वह निपटारा कर चुका था, मौत उसे नहीं चाहती थी, पर तब भी वह समय के मुँह पर थूककर जीवित था। तुम्हारी भली या बुरी राय की परवाह किये बिना भी, वह कभी झूठ नहीं बोलता था और अपने निर्दय कटु सत्य से मानो यह दिखला देता था कि सत्य भी कितना ऊसर और भयानक हो सकता है। खारू ने मुझसे यह कहानी कही थी। उसका वह ठोस तरीका और गहरी बेसरोकारी, जिससे उसने यह कहानी कही, मैं शब्दों में नहीं लिख सकता, पर तब भी यह कहानी सच मानता हूँ- इसका एक-एक लफ्ज।’
‘मैं किसी चीज से नहीं डरता,  हाँ सिवा भेडिय़े के मैं किसी चीज से नहीं डरता।’ खारू ने कहा। एक भेडिय़ा नहीं, दो चार नहीं। भेडिय़ों का झुंड-200,300 जो जाड़े की रातों में, निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें, जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका- उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता। लोग कहते हैं, अकेला भेडिय़ा कायर होता है। यह झूठ है। भेडिय़ा कायर नहीं होता, अकेला भी वह सिर्फ चौकन्ना होता है। तुम कहते हो लोमड़ी चालाक होती है, तो तुम भेडिय़ों को जानते ही नहीं। तुमने कभी भेडिय़े को शिकार करते देखा है किसी का- बारहसिंगे का? वह शेर की तरह नाटक नहीं करता, भालू की तरह शेखी नहीं दिखाता। एक मरतबा सिर्फ एक मरतबा- गेंद-सा कूदकर उसकी जाँघ में गहरा जख्म कर देता है- बस। फिर पीछे बहुत पीछे रहकर टपकते हुए खून की लकीर पर चलकर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ वह बारहसिंगा कमजोर होकर गिर पड़ा है। या, उचककर एक क्षण में अपने-से तिगुने जानवर का पेट चाक कर देता है- और वहीं चिपक जाता है। भेडिय़ा बला का चालाक और बहादुर जानवर है। वह थकना तो जानता ही नहीं। अच्छे पछैयाँ बैल हमारे बंजारी गड्डों को घोड़ों से तेज ले जाते हैं, और जब उन्हें भेडिय़ों की बू आती है, तो भागते नहीं, उड़ते हैं। लेकिन भेडिय़े से तेज कोई चार पैर का जानवर नहीं दौड़ सकता।
‘सुनो, मैं ग्वालियर के राज से आईन में आ रहा था। अजीब सरदी थी और भेडिय़े गोलों में निकल पड़े थे। हमारा गड्डा काफी भारी था। मैं, मेरा बाप, गिरस्ती और तीन नटनियां- 15, 15, 16 साल की। हमलोग उन्हें पछाँह लिये जा रहे थे।’
‘किसलिए?’ मैंने पूछा।
‘तुम्हारा क्या ख्याल है, मुजरा करो? अरे बेचने के लिए। और किस मसरफ़ की हैं। ग्वालियर की नटनियाँ छोटी-छोटी गदबदी होती हैं और पंजाब में खूब बिक जाती हैं। यह लड़कियाँ होती तो बड़ी चोखी हैं, पर भारी भी खूब होती हैं। हमारे पास एक तेज बंजारी गड्डा था और तीन घोड़ों से तेज भागने वाले बैल।
हमलोग तडक़े ही चल दिये थे, दिन-ही-दिन में हम लोग जानेवाले साथियों से मिल जाना चाहते थे। वैसे डर के लिए हमारे पास दो कमान और एक टोपीदार बंदूक थी। बैल हौसले से भाग रहे थे और हमलोग 20 मील निकल आये थे कि बड़े मियाँ ने घूमकर कहा- ‘खारे भेडिय़े हैं?’
मैंने तेजी से कहा- ‘क्या कहा? भेडिय़े हैं? होते तो बैल न चौंकते?’
बूढ़े ने ‘सर’ हिलाकर कहा- ‘नहीं, भेडिय़े जरूर हैं। खैर, वह हमसे दस मील पीछे हैं और हमारे बैल थक चुके हैं, लेकिन हमें पचास मील और जाना है।’ बूढ़े ने कहा- ‘और मैं इन भेडिय़ों को जानता हूँ, पारसाल इन्होंने कुछ कैदियों को खा लिया था और बेडिय़ों और सिपाहियों की बंदूकों के सिवा कुछ न बचा। बंदूक भर लो।’
मैंने कमानों को तान के देखा, बंदूक तोड़ी, सब ठीक था।
‘बारूद की नई पोंगली भी निकाल के देख ले।’ मेरे बाप ने कहा।
‘बारूद की पोंगली’- मैंने कहा- ‘मेरे पास तो पुरानी ही वाली है।’
तब बूढ़े ने मुझे गालियाँ देनी शुरू की- ‘तू यह हैं, तू वह है।’
मैंने पूरा गड्डा उलट डाला, पर नई पोंगली कहीं नहीं थी।
मेरे बाप ने भी सब टटोला- ‘तू झूठ बोलता है, तू भेडिय़े की औलाद, मैंने तुझे नई पोंलगी दी थी।’ पर वह बारूद यहाँ कहीं नहीं थी। मेरे बाप ने मेरी पीठ पर कुहनी मारते हुए कहा- ‘शहर पहुँचकर मैं तेरी खाल उधेड़ दूँगा, शहर पहुँचकर… और इसी वक्त अचानक बैल एकदम रुककर पूँछ हिलाकर जोर से भागे। मैंने सुना मीलों दूर एक आवाज आ रही थी, बहुत धीमी जैसे खंडहरों में भी आँधी गुजरने से आती है-
ह्वा आ आ आ आ आ आ आ आ!
‘हवा’- मैंने सहम के कहा। ‘भेडिय़े!’ मेरे बाप ने नफरत से कहा, और बैलों को एक साथ किया। पर उन्हें मार की जरूरत नहीं थीं। उन्हें भेडिय़ों की बू आ गई थी और वे जी तोड़कर भाग रहे थे। दूर मैं एक छोटे-से काले धब्बे को हरकत करते हुए देख रहा था। उस सैकड़ों मील के चपटे रेगिस्तानी बंजर में तुम मीलों की चीज देख सकते हो। और दूर पर उस काले धब्बे के बादल की तरह आते मैं देख रहा था। बूढ़े ने कहा- ‘जैसे ही वह नजदीक आ जाय, मारो। एक भी तीर बेकार खोया तो मैं कलेजा निकाल लूँगा।’ और तब उन तीन लड़कियों ने एक दूसरे से चिपट कर टिसुए (आँसु) बहाना शुरू किया। ‘चुप रहो’, मैंने उनसे कहा-‘तुमने आवाज निकाली और मैंने तुम्हें नीचे ढकेला।’
भेडिय़े बढ़ते हुए चले आते थे, हम लोग भूरी पथरीली धरती पर उड़ रहे थे, पर भेडिय़े! बूढ़े ने लगामें छोड़ दीं और बन्‍दूक संभाल कर बैठा। मैंने कमान संभाली- मैं अंधेरे में उड़ती हुई मुर्गाबियों का शिकार कर सकता था और मेरा बाप- वह तो जिस चीज पर निशाना ताकता था अल्लाह उसे भूल जाता था। कोई 400 गज पर मेरे बाप ने आगेवाले भेडिय़े को गिरा दिया। धाँय! उसने नटों की तरह एक कलाबाजी खाई? और फिर दूसरी बिल्कुल नटों की तरह। बैल पागल होकर भाग रहे थे, हवा में उनके मुँह का फेन उडक़र हमारे मुँहों पर मेह की तरह गिरता था और वे रंभा रहे थे जैसे बंजारिन ब्यानेवाली भैसों की नकलें करती हैं। पर भेडिय़े नजदीक ही आते जा रहे थे। गिरे हुए भेडिय़ों को वे बिना रुके खा लेते थे, वे उनके ऊपर तैर जाते थे। मेरे बाप ने मेरे कंधे पर बन्‍दूक की नली रख दी थी। धाँय-धाँय! (मेरी गरदन पर अब तक जले का दाग है।) मैंने भी 16 तीरों से 16 ही भेडिय़े गिराये, बूढ़े ने 10 मारे थे, पर तब भी वह गोल बढ़ता ही आता था।
‘ले बन्‍दूक ले!’ उसने कहा- ‘मैं बैलों को देखूँगा।’
उसका ख्याल था कि बैल इससे भी तेज भाग सकते थे, पर यह ख्याल गलत था। दुनिया के कोई बैल उससे तेज नहीं भाग सकते थे।
मैं बन्‍दूक का भी निशाना खूब लगाता था, पर वह देशी जंग लगी बंदूक। खैर, वह लडक़ी उसे 5 मिनट में भर देती थी। बादीं अच्छी लडक़ी थी, वह बन्‍दूक भरती थी, मैं निशाना मारता था- अचूक। मैंने दस और गिराये-धाँय-धाँय-धाँय! जब सब बारूद खत्म हो गई तो भेडिय़े भी कुछ हारे से मालूम होते थे।
मैंने कहा- ‘अब वे पिछड़ गये।’
बूढ़ा हँसा- ‘वह इतनी-बात से नहीं पिछड़ सकते।’ पर मैं मरते-मरते कह चलूँगा कि सात मुल्क के बंजारों में खारे-सा खरा निशानेबाज नहीं है।
मेरा बाप बुढ़ापे में बड़ा हँसोड़ हो गया था।
हाँ, तो भेडिय़े कुछ पीछे रह गये थे। उन्हें कुछ खाने को मिल रहा था। ‘सप-सप-चट’ बैलों पर कोड़ा बोल रहा था कि पांच मिनट बाद ही उन्होंने फिर हमारा पीछा शुरू किया। वे हमसे 200 गज पर रह गये होंगे और बढ़ते ही आते थे। मेरे बाप ने कहा- ‘सामान निकालकर फेंको, गड्डा हल्का करो।’
एक बारगी ठोकर खाकर गड्डा चरकराकर चला। पूरे बंजारों में यह गड्डा अफसर था, और सब सामान फेंककर हमने उसे फूल-सा हल्का कर दिया था, और कुछ देर तो हम भेडिय़ों से दूर निकलते मालूम हुए, पर तुरंत ही वे फिर वापस आ गये।
बड़े मियाँ ने कहा- ‘अब तो, एक बैल खोल दो।’
‘क्या?’ मैंने कहा- ‘दो बैल गड्डा खींच ले जायेंगे?’
उसने कहा- ‘अच्छा, तब एक नटनिया फेंक दो।’ मैंने उन तीन में से मोटी को ही उठाया गड्डे के बाहर झुलाकर फेंक दिया। हाँ! ग्वालियर की नटनिया, उसके दाँत लगा दो तो वह भी भेडिय़ों का मुकाबला कर ले! पहले तो वह भागी पर यह जानकर कि भागना बेकार है, घूमकर खड़ी हो गई और सामनेवाले भेडिय़े की टाँगें पकड़ ली। पर इससे भी क्या फायदा था। एकदम वह नजर से ओझल हो गई। जैसे किसी कुँए में गिर पड़ी हो। गड्डा हल्का होकर और आगे बढ़ा, पर भेडिय़े फिर लौट आये।
‘दूसरी फेंको- बड़े मियाँ ने कहा। पर अब की मैंने कहा- ‘आखिर क्या हमलोग सैर करने के लिए मारे-मारे फिरते हैं, एक बैल न खोल दो।’
मैंने एक बैल खोल दिया। वह पीठ पर पूँछ रखकर चिंघाड़ता हुआ भागा और गोल उसके पीछे मुड़ गया।
मेरे बाप की आँखों में आँसू भर आये। ‘बड़ा असील बैल था, बड़ा असील बैल था…’ वह बुदबुदा रहा था।
‘हम बच तो गये’- मैंने कहा। पर तभी, ह्वा आ आ आ आ आ! गोल वापस आ गया था। ‘आज कयामत का दिन है’- मैंने कहा और बैलों को इतना भगाया कि मेरी हथेली में खून छलछला आया।
पर भेडिय़े पानी की तरह बढ़ते चले आ रहे थे और हमारे बैल मर के गिरना ही चाहते थे। ‘दूसरी लडक़ी भी फेंको!’- मेरे बाप ने चीखकर कहा।
इन दोनों में बादीं भारी थी और कुछ सोचकर काँपते हाथों वह अपनी चांदी की नथनी उतारने लगी थी और मैंने शायद बताया नहीं,  मुझे वह कुछ अच्छी भी लगती थी।
इसलिए मैंने दूसरी से कहा- ‘तू निकल!’ पर उसको तो जैसे फालिज मार गया था। मैंने उसे गिरा दिया और वह जैसे गिरी थी, वैसे ही पड़ी रही। गड्डा और हल्का हो गया और तेज दौड़ने लगा। पर पाँच ही मील में भेडिय़े फिर वापस आ गये। बड़े मियाँ ने गहरी साँस ली, माथा पीट लिया- ‘हम क्या करें, भीख माँग के खाना बंजारों का दीन है, हम रईस बनने चले थे…।’
मैंने बादीं की तरफ देखा, उसने मेरी तरफ। मैंने कहा- ‘तुम खुद कूद पड़ोगी कि मैं तुम्हें ढकेल दूँ। उसने चांदी की नथ उतारकर मुझे दे दी और बाँहों से आँखें बंद किये कूद पड़ी। गड्डा बिल्कुल हवा से उडऩे लगा। वह पूरे बंजारों में गड्डों का अफसर था।
पर हमारे बैल बेहद थक गये और बस्ती तक पहुँचने के लिए अब भी 30 मील बाकी थे। मैं बन्‍दूक के कुन्‍दे से उन्हें मार रहा था, पर भेडिय़े फिर लौट आये थे।
मेरे बाप के मुँह से पसीना टपकने लगा- ‘लाओ दूसरा बैल भी खोल दो।’
मैंने कहा- ‘यह मौत के मुँह में जाना है। हमलोग दोनों मारे जायेंगे, हमें या तुम्हें किसी को तो बचना चाहिए।’
‘तुम ठीक कहते हो।’ उसने कहा- ‘मैं बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी जिन्‍दगी खत्म हो गई। मैं कूद पडूँगा।
मैंने कहा- ‘हिरास मत होना। मैं जिन्‍दा रहा तो एक-एक भेडिय़े को काट डालूँगा।
‘तू मेरा असील बेटा है।’ मेरे बाप ने कहा और मेरे दोनों गाल चूम लिये। उसने अपने दोनों हाथों में बड़ी-बड़ी छूरियाँ ले लीं और गले में मजबूती से कपड़ा लपेट लिया।
‘रुको’- उसने कहा- ‘मैं नये जूते पहने हूँ, मैं इन्हें दस साल पहनता, पर देखो, तुम इन्हें मत पहनना, मरे हुए आदमियों के जूते नहीं पहने जाते, तुम इन्हें बेच देना।’
उसने जूते खींचकर गड्डे पर फेंक दिये और भेडिय़ों के बीचोंबीच कूद पड़ा। मैंने पीछे घूमकर नहीं देखा, लेकिन थोड़ी देर में उसे चिल्लाते सुना रहा- यह ले! यह ले! भेडिय़े की औलाद! भेडिय़े की औलाद! और फिर चट-चट! चट-चट! मैं ही किसी भेडिय़ों से बच गया।’
खारू ने मेरे डरे हुए चेहरे की तरफ देखा जोर से हँसा और फिर खखारकर बहुत-सा जमीन पर थूक दिया।
‘मैंने दूसरे ही साल उनमें से साठ भेडिय़े और मारे।’ खारू ने फिर हँसकर कहा। पर उसके साथ ही उसकी आँखों में एक अनहोनी कठिनता आ गई, और वह भूखा, नंगा उठकर सीधा खड़ा हो गया।

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