पाला मारे खेत सुने थे
शोर अकालों के
लेकिन यहाँ काठ मारे से
शहर हो गए हैं
भरे जेठ की दरकी धरती
जैसे हैं चेहरे
अंधी फरियादों के
सुनते हैं बैठे बहरे
चर्चे अबतक बहुत सुने थे
इन्हीं उजालों के
आग लगी जिनसे, सब घर
खंडहर हो गए है
दीवारों के घेरे जीते
बूढ़े शेर हुए
भीतर लोग दहकते
बाहर से पालतू सुए
शायद हमने ढोर चुने थे
भरे पुआलों से
तभी शहर के शहर यहाँ
लाशघर हो गए हैं।
शोर अकालों के
लेकिन यहाँ काठ मारे से
शहर हो गए हैं
भरे जेठ की दरकी धरती
जैसे हैं चेहरे
अंधी फरियादों के
सुनते हैं बैठे बहरे
चर्चे अबतक बहुत सुने थे
इन्हीं उजालों के
आग लगी जिनसे, सब घर
खंडहर हो गए है
दीवारों के घेरे जीते
बूढ़े शेर हुए
भीतर लोग दहकते
बाहर से पालतू सुए
शायद हमने ढोर चुने थे
भरे पुआलों से
तभी शहर के शहर यहाँ
लाशघर हो गए हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें