एक
यह नहीं देखा कि कंधों पर खड़ा हैलोग यह समझे कि वो सबसे बड़ा है
पुण्य के आकाश की सीमा नहीं है
पाप जल्दी भरने वाला इक घड़ा है
भूख क्यों हर रोज लगती है, न जाने
इस गरीबी का ये मुश्किल आँकड़ा है
देवता को हम भला क्यों पूजते हैं
पूजिए, मजदूर का ये फावड़ा है
साँप मिलते हैं विषैले उस जगह पर
जिस जगह पर भी किसी का धन गड़ा है
यह वही है जो कि कंधों पर खड़ा था
भीड़ के पैरों तले कुचला पड़ा है।
दो
अपना खुद से सामना हैइसलिए मन अनमना है
सब तनावों की यही जड़
खुद का खुद से भागना है
इसको भी तुम जीत मानो
खुद से कैसा हारना है
अपनी नजरों में गिरा जो
उसको फिर क्या मारना है
डूब जाने को सतह तक
लोग कहते साधना है।
तीन
वो आशियानों में घर रखेंगे
कि आसमानों के पर रखेंगे?
तुम्हारे कदमों के नीचे काँटे
तुम्हारे कदमों पे सर रखेंगे
तुम्हारा साया दगा करेगा
जो रास्ते में शजर रखेंगे
कि तुम भी शायद मुकर ही जाओ
हम आँखें अश्कों से तर रखेंगे
इधर है सोफा उधर है टीवी
ईमानदारी किधर रखेंगे?
तुम अपने पैरों को बाँध रक्खो
तुम्हारे आगे सफर रखेंगे
जो खुद ही खबरों की सुर्खियां हैं
वो क्या हमारी खबर रखेंगे।
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