मंगलवार, 19 अगस्त 2008

गजल



दुष्‍यंत कुमार
आज सड़कों पर

आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ो नारे न देख,
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख।

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाजुओं को देख पतवारें न देख।

अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीकत की तरह,
यह हक़ीकत देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख।

बे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

ये धुंधलका है नज़र का महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख।

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख।

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