मंगलवार, 19 अगस्त 2008

कविता



विजय किशोर मानव


एक
लिख-लिख हम हारे हैं पाती।
जो भी गया हुआ दरबारी वर्षों खबर न आती।
रहे दधीची पीढियां बीतीं, बिन दीपक, बिन बाती ।
अंधियारों पर क्‍या वश अपना, उनके संग-संघाती।
कौवे निर्णायक, पिंजरों में बंदी कोयल गाती
झंडों के पैरहन उन्‍हें, हमको डंडों की थाती।
श्‍याम झपट ले तंदुल लौट सुदामा पीटें छाती।
कई भगीरथ भेजे लाए नदियां सब बरसाती।


दो
देखो कठपुतली का खेल
पटरी जैसे बिछते हैं हम, वो गुजरें ज्‍यों रेल।
दुर्योधन हर फन में अव्‍वल, अर्जुन होते फेल।
हंस फरार, सुए पिंजरों में, कौए लिए गुलेल।
हाथ कटें हर बार मगर हम ताज गढें बेमेल।
महलों में जल रहा, झुग्‍िगयों के हिस्‍से का तेल।
हांके कोई रहती अपने हिस्‍से सिर्फ नकेल।
कान्‍हा जाए किस गोकुल जब सारी धरती जेल।

तीन
राजा झूठों के सरताज
अपनी उनकी गति है जैसे गौरेया और बाज
सबके पांव तले हैं कांटे उनके सर पर ताज
सिंहासन से नजर मिलाए गिरे उसी पर गाज
अपने घर, उनके ताले में बंदी हुए सुराज
तानसेन डोलते सड़क पर लेकर टूटे साज
कंगाली को ढकते ही खर्च हो गई लाज।

चार
लिखा है खत हुजूर को फिर से
छांह-छांह घूमे दिन भर पर धूप न उतरे सर से।
ऐसे रमे हुए पिंजरों में लौटे नहीं शहर से।
सूखे खेत, नदी लकीर सी, बादल बूंद न बरसे।
फिरें किसान तपिश में छोड़े घर अमीन के डर से।
गाय लगी किरिया में मुन्‍ना दूध-भात को तरसे।
गुप-चुप करके सुलह, दिए निकले आंधी के घर से।
रिश्‍वत दे पेंशन अब लेते डरे न कभी गदर से।

पांच
बंधु यह घर हो गया बिराना।
पांव फंसे सौ-सौ जालों में चोंच न आए दाना।
रोज मरोड़ी जाए गरदन, बोले पुलिस न थाना।
चंद उंगलियों की पुतलों को सौ-सौ नाच नचाना।
सांठ-गांठ आंधी से करके, आम लूटना-खाना।
जो मचान पर चढ़े वही, हर काम करे मनमाना।
सुध सम्‍हालते नथें उम्र भर रहे बैल का बाना।
बेटे ही मां के अंगों का करने लगे बयाना।
परछाई तक करे मुखबिरी मुश्‍िकल लाज बचाना।

छह
उड़ गई घर से सोन चिरैया।
कोल्‍हू जुते बैल बूचड़खाने में बछिया-गैया।
सूरज लंका बसे, अवध में 'गिरहन' लगी जुन्‍हैया।
उघरे नित द्रोपदी सभा में आते नहीं कन्‍हैया।
दूध-दही की नदियां सूखीं बची रेत पर नैया।
भीड़ लूटने पर आमादा हम टूटी कनकैया।
नाते-रिश्‍ते गिरवी रक्‍खे, दर्शक समझें ताता-थैया।
नींव हवेली की भरनी थी, चुन दी गयी मड़ैया

1 टिप्पणी:

राजकुमार चन्द्रा ने कहा…

‍वाकई कितना सच लिखा है विजयकिशोर मानव जी ने
दुर्योधन हर फन में अव्‍वल, अर्जुन होते फेल। और नींव हवेली की भरनी थी, चुन दी गयी मड़ैया सच में

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