मंगलवार, 19 अगस्त 2008

झलमला, स्व: पदुमलाल पन्नलाल बख्शी

स्व: पदुमलाल पन्नलाल बख्शी
मैं बरामदे में टहल रहा था। इतने में मैंने देखा कि विमला दासी अपने आंचल के नीचे एक दीपक लेकर बड़ी भाभी के कमरे की ओर जा रही है। मैंने पूछा, ''क्यों यह क्या है।'' वह बोली, ''झलमला'' मैंने पूछा, '' इससे क्या होगा। उसने उत्तर दिया, '' नहीं जानते बाबू, आज तुम्हारी बड़ी भाभी पंडित जी की बहू की सखी होकर आई है, इसलिए मैं उन्हें झलमला दिखाने ले जा रही हूं।''

तब तो मैं भी किताब फेंककर घर के भीतर दौड़ गया। दीदी से जाकर कहने लगा, ''दीदी थोड़ा तेल तो दो।'' दीदी ने कहा, '' जा अभी मैं काम में लगी हूं।'' मैं निराश होकर अपने करमे में लौट आया। फिर सोचने लगा, यह अवसर जाने न देना चाहिए। अच्छी दिल्लगी होगी। इधर-उधर देखने लगा। इतने में मेरी द्रष्टि एक मोमबत्ती के टुकड़े पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया और दियासलाई का बक्सा लेकर भाभी के कमरे की ओर गया। मुझे देखकर भाभी ने पूछा- ''कैसे आए बाबू।'' मैंने बिना उत्तर दिए ही मोमबत्ती के टुकड़े को जलाकर सामने रख दिया। भाभी ने हंसकर पूछा- ''यह क्या है।'' मैंने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, ''झलमला''

भाभी ने कुछ न कहकर मेरे हाथ में पांच रुपए रख दिए। मैं कहने लगा, '' भाभी क्या तुम्हारे प्रेम के आलोक का इतना ही मूल्य है।'' भाभी ने हंस कर कहा, ''तो कितने चाहिए।'' मैंने कहा, '' कम-से-कम एक गिन्नी।'' भाभी कहने लगी, ''अच्छा इस पर लिख दो, मैं अभी देती हूं।''

आठ वर्ष व्यतीत हो गए। मैं बी:ए: एल:एल:बी होकर इलाहाबाद से घर लौटा। घर की वैसी दशा न थी, जैसी आठ वर्ष पहले थी। न भाभी थी, न विमला दासी ही। भाभी हम लोगों को छोड़ कर स्वर्ग चली गई थी और विमला कटनी में खेती करती थी।

संध्या का समय था। मैं अपने कमरे में बैठा न जाने क्या सोच रहा था। पास ही कमरे में पड़ोस की कुछ स्त्रियां के साथ दीदी बैठी थी। कुछ बाते हो रही थी। इतने में मैंने सुना, दीदी किसी स्त्री से कह रही है, कुछ भी हो बहिन, मेरी बड़ी बहू घर की लक्ष्मी थी। उस स्त्री ने कहा, हां बहिन। खूब याद आई, मैं तुमसे पूछने वाली थी। उस दिन तुमने मेरे पास सखी सन्दूक भेजा था न। दीदी ने उत्तर दिया हां बहिन। बहू कह गई थी उसे रोहिणी को दे देना। उस स्त्री ने कहा, उसे मैंने खोल कर एक दिन देखा उसमें खूब हिफ़ाजत से रेशमी रूमाल में कुछ बंधा हुआ मिला। मैं सोचने लगी कि वह क्या है। कौतूहलवश उसे खोलकर देखा। बहिन। कहो तो भला उसमें क्या रहा होगा। दीदी ने उत्तर दिया, गहना रहा होगा। उसने हंस कर कहा, नहीं गहना न था, वह तो एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उस पर लिखा हुआ था-एक गिन्नी, मुझे दे दो। मेा उस कमरे मैं पहुंचा और उस स्त्री से कहा, मुझे वह रूमाल दे दो। कुछ स्त्रियां मुझे देखकर भागने लगी। कुछ इधर-उधर देखने लगी। उस स्त्री ने अपना सिर ढांपते-ढांपते कहा, अच्छा बाबू। मैं उसे कल भेज दूंगी। पर मैंने रात को ही एक दासी भेज कर उस गिन्नी के टुकड़े को मंगा लिया। उस दिन मुझसे कुछ खाया नहीं गया। पूछे जाने पर मैंने यह कह कर टाल दिया कि सिर में दर्द है। बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता रहा। जब सब सोने के लिए चले गए तब मैं अपने कमरे में आया। मुझे उदास देख कर कमला पूछने लगी- सिर का दर्द कैसा है। पर मैंने कुछ उत्तर नहीं दिया। कमला ने पूछा यह क्या है। मैं उत्तर दिया, झलमला। कमला कुछ न समझ सकी। मैंने देखा थोड़ी देर में झलमले का शुद्व आलोक रात्रि के अंधकार में विलीन हो गया।

2 टिप्‍पणियां:

ram ने कहा…

Hari Bhai....

Tumhara Blog dhekh kar dil khush hua. Padam lal punna lal ko kabhi high school me pada tha. aaj yahan unki kahani padkar bahut accha laga.

blog ka colour cobination bahut accha hai.

blogke liye bahut sari badhaiyan

बेनामी ने कहा…

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