गुरुवार, 26 जुलाई 2012

तुम्हारे बिना/अशोक वर्मा



दिन उगते ही दोनों में फिर कहा-सुनी हो गयी। गरमा-गरमी में दो-चार गालियां भी बक दीं उसने। शायद रुपयों-पैसों को लेकर ठनी थी।

दोनों का गुस्सा चरमसीमा पर था। चुप्पी ओढ़े ही पत्नी एक अदद साड़ी लपेट मायके आ गयी। दोनों बच्चे साथ ही थे।

‘‘एक-दो महीने चैन से कटेंगे… जीना हराम किये है साली।’’ दांत भींचते हुए वह बुदबुदाया।

पहली तारीख -

वेतन उसकी मुट्ठी में था। जब चाहे,  वह इच्छानुसार मुट्ठी खोलने लगा। रात गये तक लौटना,  मित्रों में बतियाते रहना,  होटल में ही डिनर…।

आज सुबह दूधवाले के नौकर ने दरवाजा ठेलते हुए उसके हाथ में बिल थमा दिया। आंख मलते हुए उठकर बाहर आया तो देखा- मकानमालिक भी उसी पर नजरें गाड़े हुए था। वह गर्दन झुकाकर वापस लौट आया।

भीतर आकर वह देर तक समीप ही रखे ढीले बटुए को ताकता रहा।

अब उसकी उंगलियां पत्नी को पत्रा लिखते हुए कागज पर तेजी से दौड़ रही थीं।

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