गुरुवार, 26 जुलाई 2012

कारावास/ उषा वर्मा (यू के)

आज डॉ. अनिला को अपना घर छोड़कर नर्सिंग होम जाना है। सुबह से ही उनके मन पर एक तरह की घबराहट छा रही है। रात में वह ठीक से सो भी नहीं सकीं। डॉक्टर ने सब इंतजाम कर दिया था। बार-बार भूल जाना ही उनकी परेशानी है। कभी गैस खुली छोड़ दी, कभी पानी नल से बहता रहा। अभी पिछले हफ्ते की ही बात है, बाहर के दरवाजे में चाबी लगी छोड़ दी। आधी रात को घंटी की आवाज सुनते ही घबराकर उठीं। दरवाजे पर पुलिस खड़ी थी। पुलिस ने अनिला की घबराहट देखकर उसे धीरज बंधाया और कहा, ”परेशान होने की कोई बात नहीं है। बस आप अपनी चाबी लेकर दरवाजा अंदर से लॉक कर लें और आराम से सो जाएं।” तब कहीं जाकर उनकी कंपकंपी बंद हुई। उन्होंने डॉक्टर से बार-बार पूछा था- वह वापस कब आएंगी, पर उन्हें कोई सीधा जवाब नहीं मिलता। यों तो वह एकदम ठीक हैं, बस कभी-कभी भूल जाती हैं। खुद डॉक्टर हैं, सब कुछ समझती हैं। यहीं न्यूकासल के अस्पताल में सारा जीवन काम किया था। फिर यहीं से रिटायरमेंट लेकर सोचा था कि अभी तक जो कुछ नहीं कर पाई हैं, अब करेंगी। पैसा खूब था ही, अकेली जान। बड़ी शान से रहती थीं। अपने को जितना भी हो सकता था, बदल दिया था। भारत छूटा तो उस संस्कृति को भी छोड़ दिया। रंग को छोड़कर बाकी सब कुछ झाड़-पोंछकर साफ कर दिया था। जब कभी भारत जातीं तो छोटे भाई-बहनों के लिए अच्छे-अच्छे उपहार ले जातीं, कभी बाहर खाना खिलाने ले जातीं, कभी घुमाने। अत: भाई-बहन उन्हें घेरे रहते। चाहते, वह उन्हीं के पास रहें, पर वह कहतीं, ”मुझे अपने लिए थोड़ा सा वक्त चाहिए।” घर पर न रुककर किसी बड़े होटल में ठहरतीं।
छोटा भाई बुलू कहता, ”दीदी, मेरे पास यहीं घर पर रहो न!”
”ना-ना बुलू, मेरी तो इनडिपेंडेंट रहने की आदत पड़ गई है। तेरे पास आती रहूंगी।”
बुलू से बहुत लगाव था। जीवन भर मेंटल अस्पताल में काम किया था, पर अब वह खुद ही… फिर भी सोचतीं. भूलने के लिए कोई अपना घर थोड़े ही न छोड़ देता है। सोचा, इंडिया से छोटी बहन को बुला लें। अब टिकट खरीदने की तमाम झंझटें, कैसे क्या करें? इसी समय सैली आ गई। सैली से उनकी जान-पहचान अस्पताल में हुई थी। सैली नर्स थी.  लंबी, दुबली, हंसमुख स्वभाव की। अपने काम में होशियार। अनिला सैली के साथ दो महीने की छुट्टी लेकर यूरोप भ्रमण के लिए गईं। दो महीने लगातार साथ रहने से अनिला को सैली के उदार हृदय को समझने का मौका मिला.  सैली अपना काम बड़ी ईमानदारी तथा लगन से करती थीं। उम्र में छोटी होने पर भी उन्होंने अनिला को सदा सहारा दिया। सैली को लेकर एक ट्रैवल एजेंट के पास गईं, सब कुछ पता लगाकर वापस आ गईं। बहन को फोन किया, उसने बताया कि टिकट तो यहां से रुपयों में खरीदने में सस्ता पड़ेगा। सैली ने भी कहा कि फिर तो तुम रुपये भेज दो, वही ठीक रहेगा। घर आकर एक सप्ताह बाद बैंक से पैसे भेज दिए। बहन को लगा, अपना घर-बार छोड़कर कहां चली जाएं, फिर सोचा. चलो, इसी बहाने घूम भी आएंगी। अब पैसे तो आ ही गए हैं। सप्ताह भर बाद बहन आ गई। अनिला बेहद खुश थीं। बहन के साथ बाजार जातीं, शॉपिंग करतीं और उसे अपने दोस्तों से मिलातीं। समय तो जैसे पंख लगाकर भाग रहा था। फिर बहन ने कहा, ”अन्नू, मैं जब आई हूं तो यूरोप भी घूम आती हूं, इसलिए मैं वीजा भारत से ही बनवाकर लाई हूं।”
अनिला ने कहा, ”ठीक है, तुम घूम आओ। मेरी तबीयत ठीक रहती तो मैं भी साथ चलती।”
एक महीने की यूरोप यात्रा का टिकट भी आ गया। बहन यूरोप घूमने में इतनी खो गईं कि यह भूल गईं कि वह यहां क्यों आई हैं। खूब घूमना, दावत खाना, बस इसी सब में समय निकल गया। उनका वीजा खत्म हो रहा था। अनिला चाहती थीं कि वह और कुछ दिनों तक रहें, पर बहन का मन अब भर गया था। वह तमाम उपहार लेकर भारत वापस चली गईं।
अनिला अकेली जिन्दगी से जूझने का प्रयास करती रहीं। उन्हें इस बात का एहसास होने लगा कि समय के साथ-साथ रिश्ते भी बदल गए हैं, कोई भी चीज पहले जैसी नहीं रह गई है.  लेकिन डॉक्टर का कहना है कि घर में अकेले उनका रहना ठीक नहीं है। नर्सिंगहोम जाना ही होगा। अनिला ने अपनी दोस्त को बुलाया है, कुछ सलाह लेगी. क्या सामान ले जाए और क्या-क्या करे। उठकर बाथरूम से जो जरूरी लगा. टूथ-ब्रश, साबुन, छोटी तौलिया वगैरह एक बैग में भरकर रख दिया, सोचा. दो-तीन महीने में वापस आ जाएंगी लेकिन मन नहीं माना, उसे उठाकर अपने बैग में रख लिया। छोटा भाई बुलू जब पहली बार लखनउ गया था तब इसे लाया था। बड़े ही उत्साह से उसने यह भाई दूज पर दिया था। बोला था, ‘मैं तुम्हें इस बार रुपये नहीं दूंगा, दीदी, यह सिपाही तुम्हारे पास रहेगा।’
यह सोचकर उसे अपने पर्स में डाल लिया। क्या पता कब आना हो, साथ रखना ही ठीक होगा। फिर और सामान रखने लगीं। थोड़ा सामान रखकर थक गई थीं, अत: बैठ गईं। टुकड़ों-टुकड़ों में अतीत सामने आता, लुभाता और अदृश्य हो जाता। इसी समय सैली आ गईं। इधर-उधर की बातें करती रहीं, फिर अपनी अटैची में अपनी पसंद के कपड़े रखे अटैची की जेब में कुछ चिट्ठियां रखी थीं, उन्हें निकाला। एक पत्र खोला, लेकिन आंखें बंद कर लीं, मानो भीतर की आंखों से पढ़ रही हों। धीरे से बोलीं, ”ग्रैहम, आज मुझे सबसे ज्यादा तुम्हारी जरूरत थी, लेकिन…।” और घबराहट को छिपाने की कोशिश में जल्दी-जल्दी सैली से कुछ-कुछ बातें करने लगीं, ”सैली, तुम तो आओगी न! वहां मेरा मन कैसे लगेगा?” फिर खुद ही बोलीं, ”अखबार तो रहेगा ही और शायद कुछ मैगजीन भी मिल जाएं।”
सैली ने बड़े ही कोमल स्वर में कहा, ”घबराओ नहीं, जब तुम्हारा मन हो, फोन कर देना, मैं आने की पूरी कोशिश करूंगी।” फिर धीरे से हंसीं, ”अनिला, क्या पता, तुम्हें वहां कोई ऐसा दोस्त मिल जाए कि तुम्हें मेरी याद ही न आए?”
अनिला की आंखों में उदासी की एक झीनी परत उतर आई। आंखें बंद कर लीं, सिर दीवार से टिका लिया। मुस्कराकर धीरे से बोलीं, ”हां, याद ही न आए, वही अच्छा है।” उसी समय घंटी की आवाज सुनकर वह हड़बड़ाकर उठीं।
एंबुलेंस देखकर सैली बाहर गईं और दरवाजा खोल दिया, ”अनिला, टाइम हैज कम।”
हाथों को मलते हुए सारे घर को देखने लगीं। मन को सहारा देने के लिए धीरे  से बोलीं, ”सब कुछ ठीक है, मैं जल्दी ही वापस आउंगी।”
उनके कांपते हाथों को पकड़कर सैली ने कहा, ”मैं कल ही तुमसे मिलने आउंगी। अपना ख्याल रखना।”
एंबुलेंस चली जा रही थी। जितनी दूर तक निगाह जा सकती थी, वह घर को देखती रहीं, फिर आंखों में भर आए आंसू को रूमाल से दबाकर सुखा लिया। यही जीवन है। आखिर उनकी मंजिल आ गई। एंबुलेंस का दरवाजा खुला। सहारे के लिए बढ़े दो हाथों को पकड़कर उतर पड़ी और धीरे -धीरे  बिल्डिंग के अंदर चली गईं। नर्स आगे बढ़कर उनको रूम नंबर-8 में ले गई। थोड़ी देर बेड पर बैठी रही, फिर खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गईं। खूब पानी बरस रहा था। खिड़की पर से फिसलता हुआ पानी नीचे बह रहा था। ठीक इसी तरह उनके दिमाग से भी सब कुछ फिसल जाता है लेकिन कहीं कुछ है, जो बांधता है, बिजली-सा चमककर चारों तरफ उजाला-ही-उजाला कर देता है। बचपन के उन दिनों में जब चाची अपने मायके जाती थीं और अपने सभी बच्चों को मां के पास छोड़ जाती थीं। क्या नाम दें उन अनाम रिश्तों को! सभी भाई बहन इधर-उधर बराबर के थे। आपस में लड़ाई-झगड़ा, आम की गुठली किसे मिली! तब किसे इतनी समझदारी थी कि गुठली में तो कुछ भी नहीं रहता, बस लड़ाई होती तो बड़ी बहनें दोनों तरफ बच जातीं। सारी डांट उनको और शरत को ही पड़ती। सजा भी मिलती। सजा का तो कोई दुख न था, पर जब बड़ी बहनें हंसती तो मन में आग लग जाती। पर कर कुछ भी न पाती। शरत को बड़ा अच्छा लगता कि इतनी लड़कियों के बीच में वह अकेला लड़का है। उन दिनों घर की छत पर खपड़े छाए जाते थे। उनमें अकसर ही गेंद अटक जाती थी। कोई-न-कोई नौकर रहता जो उतार देता पर उस दिन घर पर कोई न था, गेंद जाकर कहीं अटक गई। अब छत पर कौन जाए! एक सीढ़ी लगाई गई, जब शरत उपर चढ़ गया, गेंद नीचे फेंक दी तो बड़ी दीदी ने सीढ़ी खींच ली। बस फिर क्या था, अनिला गला फाड़कर पूरी ताकत से चिल्लाई- ‘सीढ़ी लगाओ, सीढ़ी लगाओ।’ शरत बड़े गर्व से चिल्लाया, ‘अरे, मैं तो यहां से कूद सकता हूं।’ अनिला यादों में डूबी सब भूल गईं, कहां बैठी हैं। बड़े जोर से चिल्लाईं, ”नहीं-नहीं।”
नर्स दौड़कर आई, क्या हुआ, क्या हुआ? कहती हुई अनिला से बार-बार पूछने लगी। ”कुछ नहीं, मैं एकदम ठीक हूं। कोई बात नहीं।” अनिला फिर अपनी दुनिया में लौट गईं।
अब अनिला क्या नाम दें उस रिश्ते को, फिर आज शरत क्यों याद आ रहा है। छह साल की उम्र का वह रिश्ता कैसा था! उस संसार में सिवाय एक-दूसरे के साथ खेलने के, उछल-कूद करने के और था ही क्या! उन्हीं दिनों अस्पताल में एक नए डॉक्टर आए थे। उनके तीन बच्चे थे। फिर सब कभी-कभी अस्पताल चले आते, वहां कोई रोक-टोक करने वाला न था। अस्पताल के अहाते में आम के बड़े बड़े पेड़ थे, शरत के पापा वहां जाते थे। डॉक्टर साहब और शरत के पापा की बड़ी गहरी दोस्ती थी। डॉक्टर साहब के यहां चाची की तरह कोई औरत न थी। बस एक आया थी, पूरी आजादी थी। डॉक्टर साहब अस्पताल में मरीजों के साथ और हम आम के पेड़ों पर. न जीत की खुशी, न हार का गम। पेड़ों पर उछलना-कूदना अनिला हंस पड़ीं। वह सोचती रहीं। उन दिनों की वह खुशी कहां गई? फिर जाने क्या सोचकर हथेली फैलाई, दूसरे हाथ से लकीरों को फैलाती-सिकोड़ती देखने लगीं। इन लकीरों का क्या भरोसा! हां, ठीक ही तो है, वह कब सब छोड़-छाड़कर बड़ी होने लगीं। वह संसार बिखर गया। कौन कहां गया, किसने क्या किया, बस इतना ही मालूम रहता। चाची शहर चली गईं। मां भी कभी-कभी याद करके उदास हो जातीं, लेकिन मिलना बहुत कम होता। फिर अनिला मेडिकल में पढ़ने चली गईं। एक अनोखी दुनिया! यहां कदम-से-कदम मिलाकर चलना ही जीवन का मंत्र बन गया। छोटे-छोटे सुख जाने कहां खो गए! नए-नए दोस्त, लाइब्रेरी, रेस्टोरेंट, लैब और सबके उपर मेडिकल की मोटी-मोटी किताबें! फुरसत कहां कुछ और सोचने की। मेडिकल कॉलेज के दिनों में लगा था. मुट्ठी में सारी दुनिया बांध लेंगी, फिर उन्हीं लकीरों को पढ़ने का प्रयास। दिमाग पर जोर डाला. एक पुरुष आकृति धुंधली सी छाया, वह सब कुछ नकारकर यहां आ गई थी। क्या पाया उसने? मेडिकल कॉलेज के दिनों में इन आंखों में संसार बसा था। फिर वही आकृति झांकने लगी, घोड़े की सवारी और फिर गिरना। फिर तो बस एंबुलेंस, दवा, बेहोशी। सिर में चोट आई थी। हाथ अपने आप पीछे सिर पर चला गया। चेहरे पर एक नटखट हंसी बिखर गई।
दो महीने बाद क्रिसमस में दो हफ्ते ही बचे थे। रात भर सोचती रहीं घर जाने के लिए। दूसरे दिन जब डॉक्टर दौरे पर आए, बेड से नीचे उतरने की कोशिश में गिर गईं पर डॉक्टर से छिपाते हुए बोलीं, ”मेरा पैर फंस गया था, अब तो मैं अच्छी हो रही हूं। मैं कुछ दिनों के लिए अपने घर जाना चाहती हूं।”
उम्र का सम्मान करते हुए डॉक्टर ने कहा, ”ठीक है, मैं आपकी बात कंसल्टेंट से कह दूंगा।”
दूसरे दिन कंसल्टेंट आए तो अनिला ने दोनों हाथ जोड़ दिए, ”मुझे एक बार मेरे घर जाने दीजिए।”
कंसल्टेंट ने मन में सोचा. हालत में कोई सुधर तो हो नहीं रहा है, शायद एक बार जाने देना ही ठीक रहेगा किन्तु अनिला से बोले, ”ठीक है, मैं दो-तीन दिन में सारे कागज ठीक करवा देता हूं, आप दो सप्ताह के लिए घर जा सकेंगी। घर तो वैसे भी सेल पर लगा है।” फिर सोशल वर्कर को बुलाकर कहा, ”सब इंतजाम कर दें।” और वह चला गया।
अनिला ने पूछना चाहा कि घर सेल पर क्यों लगा है, पर तब तक वह जा चुका था। उन्हें लगा सारी दुनिया ही घूम रही है। घर सेल पर लगा है! क्या अब वह घर उनका नहीं रहा? घर, वे सारे कमरे, जहां जिन्दगी की सारी स्मृतियां बिछी पड़ी हैं। गार्डन, जिसे उन्होंने अपने हाथों से संवारा है। ग्रेहम आता था, उसी ने दीक्षा दी थी। बागबानी की। शुरू-शुरू में वह पैसे ले लेता था, फिर एक बार अनिला ने उसे शाम को ड्रिंक पर बुलाया, तब बातचीत में उन्हें मालूम हुआ कि ग्रेहम सब पैसे चैरिटी में दे देता है। बाद में उसने पैसे लेना छोड़ दिया। धीरे-धीरे ग्रेहम से उनकी दोस्ती हो गई। वह अकसर दिन में आता, गार्डन में काम करता, शाम को अनिला के साथ पब या कहीं रेस्टोरेंट में खाना खाने चला जाता। बहुत दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। अनिला एक बार फिर जिन्दगी के सपने देखने लगी थीं। सब कुछ खुशनुमा लगने लगा था।
और तभी ग्रेहम एक दिन बिना कुछ बताए, बिना कुछ कहे उन्हें छोड़कर चला गया। वह सोचतीं, क्या बात हुई? ग्रेहम क्यों एक शून्य बन गया? उस दिन वह फिर रोईं, ऐसा हृदय विदारक रोना पर ठीक इसी तरह, अब से चालीस साल पहले वह भी किसी को बिना कुछ बताए इंग्लैंड चली आई थीं। कितना पूछा था, एक बार बस इतना बता दो, क्यों यह निर्णय लिया है? लेकिन वह हर बात को चुपचाप पी गईं। उसी तरह आज ग्रेहम चला गया। क्या किसी बात पर ग्रेहम को भी अपनी बेइज्जती महसूस हुई! बहुत दिनों बाद ग्रेहम का एक लिफाफा मिला। पता नहीं था। बस एक लंबा पत्र-
‘अनिला डियर,
मैं अब तुमसे बहुत दूर जा रहा हूं। पत्नी के मरने के बाद मैंने बीस साल तक अपने को कैद कर लिया था। स्कॉटलैंड के जिस अस्पताल में मैं सर्जन था, जब वहीं अपनी पत्नी को किसी भी तरह नहीं बचा सका तो मैं नौकरी छोड़कर चला आया। तुम्हें रोज देखता था और फूलों के तुम्हारे शौक को देखकर ऐसा लगा कि क्यों न मैं भी तुम्हारी इस खुशी में शामिल हो जाउं । मेरी पेंशन तथा मकान बेचकर इतना पैसा था कि मैं तुम्हारे साथ बड़े आराम से रह सकता था, पर मुझे ऐसा लगा कि तुम मुझे एक माली की तरह घर बुलाती हो, पब भी जाती हो, पर जो जगह मैं चाहता हूं, वह मुझे नहीं मिली। तुम्हें बता दूं कि मैं सर्जन था, तब तुम मुझे स्वीकार करो, ऐसा करने को मेरा मन नहीं हुआ। स्वत: जो प्यार तुमसे चाहता था, उसके लायक तुमने मुझे नहीं समझा। जा रहा हूं। क्या पता फिर मिलना होगा या नहीं।
अलविदा!
ग्रेहम’
अनिला ने पत्र मोड़कर रख दिया, फिर धीरे  से कहा, ‘अलविदा।’
सोचती रहीं, मेरे साथ क्या यही होता रहेगा! आंखों से आंसू बहते रहे और वह बार-बार अलविदा-अलविदा धीरे-धीरे  निराश स्वर में कहती रहीं। वहां जब भी किसी ओर देखतीं, उन्हें लगता, ग्रेहम की छाया मंडरा रही है। कभी-कभी बहुत खुश होने पर ग्रेहम उन्हें चुपचाप देखता रहता। तब एक आसरा सा हो जाता। लगता, ग्रेहम यहीं कहीं पास में खड़ा है। जीवन के चौहत्तर वर्ष ऐसे ही आज-कल, आज-कल करते-करते निकल गए। बगीचे में जातीं तो सोचतीं, अब मिट्टी कितनी खराब होने लगी! कहीं भी खोदो तो जैसे सब पत्थर हो गया है। उन्हें इस बात का एहसास ही न होता कि उनकी कलाइयों में वह ताकत ही नहीं रह गई। फिर एक दिन आया था, जब उन्हें नर्सिंगहोम ले जाया गया। घर, बगीचा सब छूटा, केवल अंजुरी भर स्मृतियां ही साथ रह गईं।
आज वह दिन आ गया, जब कंसल्टेंट ने उन्हें घर जाने की इजाजत दे दी थी। वह घर जाने के लिए एंबुलेंस में बैठीं। अपने बैग में बुलू का दिया सिपाही रखना न भूलीं। यादों का रेला आगे-पीछे, उपर-नीचे चारों तरफ से घेरकर उन्हें अतीत में ले जाता। ग्रेहम के जाने के बाद वह एकदम बेबस सी हो गई थीं। जो काम तब वह मिनटों में कर लेती थीं, वही अब शिथिल पड़ी रहतीं। कुछ न होता तो जाकर इंस्ट्रक्शन की किताब उठा लातीं, पढ़तीं, पर कुछ भी पल्ले न पड़ता था। माइक्रोवेब यों ही पड़ा रहता, कभी खाना गरम कर लेतीं, कभी वह पड़े-पड़े उसी में सूख जाता। कितनी बार ऐसा हुआ कि दूध की बोतल खोल ही नहीं पाईं, बाहर पड़े-पड़े दूध बेकार हो गया और तब जिन्दगी बेकार लगने लगी थी। एंबुलेंस घर के सामने रुकी। ‘फॉर सेल’ का बड़ा सा साइनबोर्ड देखकर हाथ-पैर ढीले पड़ने लगे। साथ आई नर्स ने पानी दिया तो मन कुछ शांत हुआ। अंदर गईं। नर्स ने कमरा खोल दिया। एक घुटन, किधर देखें, क्या करें!
नर्स ने सोचा, इन्हें शायद थोड़ा वक्त चाहिए, मेरे सामने तो शायद रो भी न सकें। अत: वह यह कहकर कि मैं थोड़ी देर में आउंगी, बाहर चली गई। ड्राइंगरूम में गईं, ब्रिजक्राफ्ट का सोफा कितना घूम-घूमकर आठ-दस दुकानों में देखकर खरीदा था, चादर से ढके रहने पर भी धूल से अंटा पड़ा था। चादर हटाकर बैठने लगीं तो लगा, ग्रेहम ने हाथ पकड़कर अपने पास बैठा लिया है। एकदम से खड़ी हो गईं। चाइना की अलमारी खोली, रोजेनथाल का चेहरा बना हुआ वाइन बॉटल स्टापर कभी ग्रेहम ने उनके जन्मदिन पर जर्मनी से लाकर दिया था। उसे हाथ में लेकर सहलाती रहीं, कहां ले जाएंगी इसे। कभी उन्हें नाज था अपनी पसंद पर। वेजवुड का डिनर सेट वह हर क्रिसमस पर निकालतीं। अंग्रेज कंसल्टेंट कहते, ‘अनिला, यू ऑर वन अहेड ऑफ अस।’ अब यहां मेरा कुछ भी नहीं है। आगे बढ़ती गईं, पैटियो का दरवाजा खोला। अनिला को लगा, स्मृतियों की नदी हरहराती हुई उनको घेरती जा रही है। ग्रेहम ने छोटे-बड़े कोनिफर से शतरंज के मोहरे बनाकर गार्डन को एक नया रूप दे दिया था। तो दूसरी तरफ एक पैगोड़ा बनाकर कांसे की भगवान बुद्ध  की मूर्ति रखी थी। मूर्ति के सामने बैठकर वह सिसक-सिसककर रोने लगीं। काफी दिनों से देखभाल न होने के कारण सारा गार्डन तहस-नहस हो रहा था। अनिला को लगा, ऐसा ही मेरा जीवन है। नर्सिंगहोम में ही मेरा अंत होगा। मेरा कोई नहीं है। क्यों हर वह खुशी मिलते-मिलते छूट गई? दो हफ्ते यादों के जंगल में भटकती रहीं, फिर वापस नर्सिंगहोम आ गईं, हालत बिगड़ती गई।
सैली ने फोन किया, ”अनिला, मैं आ रही हूं। तुम्हारी चिट्ठी आई है।”
मन-ही-मन बड़ी खुश हुईं, शायद बुलू को याद आई हो। याद कैसे नहीं करेगा, उसका सिपाही अभी भी मेरे पास है। सब कुछ भूल जाउं, पर तुम्हें कैसे भूल सकती हूं। उठीं, बैग खोला, सिपाही को निकाला और सैली का इंतजार करने लगीं। थोड़ी देर में सैली आ गईं। उन्हें बैठने को कहकर इस उम्मीद में खड़ी रहीं कि सैली चिट्ठी देगी। सैली असमंजस में थीं. क्या करें, कैसे अनिला को बताएं कि बुलू नहीं रहा। चिट्ठी नहीं, तार आया था, पर सैली ने सोचा. तार कहने से अनिला घबरा जाएंगी। वहीं जाकर किसी नर्स को तार दे देंगी पर अब हिम्मत बांधकर किसी तरह बोलीं, ”अनिला, बुलू…।”
”हां-हां, बुलू ने क्या लिखा है?”
”कुछ नहीं, अनिला। बुलू बहुत बीमार था, दो दिन पहले नहीं रहा।”
”क्या कह रही हो? क्या… बुलू…।” कहते-कहते बिस्तर पर गिर गईं। बुलू का सिपाही उनकी हथेलियों में भिंचा पड़ा था।
सैली भागी-भागी गईं, नर्स को बुला लाईं। नर्स ने इंजेक्शन देकर आराम से लिटा दिया। सैली थोड़ी देर बैठी रहीं, फिर घर चली गईं।
दूसरे दिन अनिला की आंखें खुलीं तो सिर चकरा रहा था। बहुत हिम्मत करके उठीं, मुंह-हाथ धेकर बैठी थीं कि एकाएक याद आया. कल सैली आई थी, क्या कह रही थी, दिमाग पर जोर डाला फिर समझ में आ गया. बुलू… एक जोर की चीख निकल गई, हिलक-हिलककर रोने लगीं। धीरे-धीरे  कुछ बोलते हुए पड़ी रहीं। कौन उनका साथ दे? किससे मन की असह्य वेदना बांटें? मन होता, कोई उन्हें अपनी बांहों में भर ले, सिर पर अपना हाथ रख दे। मां-बाप तो चले गए, पर इतने भाई-बहनों के रहते हुए भी यह अकेलापन झेल नहीं पा रही थीं। धीरे-धीरे  वह अपने मन के कारावास में बंद हो गईं। खाना-पीना छूट रहा था। इच्छाशक्ति खत्म हो रही थी।
इसी तरह तीन महीने और निकल गए। अनिला अब पहचान में भी नहीं आ रही थीं। सिर के थोड़े से बचे बाल इधर-उधर उलझकर फैले थे। नाखून बढ़कर अंदर को मुड़ गए थे। चेहरा झुलस-सा गया था। पैरों के नाखून गंदे, कटे-फटे, मोटे पड़कर बेजार हो रहे थे। एड़ियों में पड़ी दरारों से खून झलक रहा था। कोई भी आता तो कभी पहचान लेतीं, कभी आंखों में फैला डरावना सूनापन देखकर मन सहम जाता। पैरों में रूमाल लपेट लेतीं, मजाल नहीं कि कोई नर्स छू भी ले। कपड़े भी जैसे-तैसे ढीले होकर इधर-उधर लटक रहे थे। उन्हें कोई होश न था। अब जीवन में कोई रस न रहा। नर्स खाना लाती, रखकर चली जाती, थोड़ी देर बाद आती तो प्लेट में सब कुछ वैसा ही पड़ा रहता। भूख-प्यास से विरक्त, चुपचाप पड़ी रहतीं। कभी पलकों में नाचते सपनों में बुलू की छवि उतरती, कभी पुराना घर, कभी नया घर। मन के इस कारावास में जितनी जगह थी, उसी में विचरतीं।
आज सुबह से मन में घुमड़ रहा था. ग्रेहम तुमने मुझे क्यों छोड़ा? अपने से पूछा, तुमने क्यों बिना बताए भारत से भागने का मन बना लिया और बुलू, तुम क्यों चले गए? सवाल-ही-सवाल हैं, किसी का जवाब नहीं। प्यास से गला सूख रहा था, पर हाथों में इतनी शक्ति नहीं बची थी कि गिलास उठाकर पानी पीतीं। घंटी पर हाथ गया, नर्स आई तो, पर वह बड़े ही रूखे स्वर में बोली, ”अब क्या?”
कातर भाव से नर्स की ओर देखा। संकेत से पानी मांगा। नर्स ने यंत्रावत् पानी पिला दिया और चली गई। अनिला फिर जिन्दगी की उसी भूल-भुलैया में लौट गईं, भटकती रहीं।
इसी समय नर्स ने आकर कहा, ”फोन है।”
फोन का नाम सुनकर कुछ चैतन्य हुईं।
फिर नर्स ने कानों के पास झुककर कहा, ”तुम्हारी दोस्त सैली का।”
कोई जवाब न पाकर वह चली गई।
सैली ने सोचा. समय गंवाने से कोई फायदा नहीं है। उसने ग्रेहम से कहा, ”चलो मेरे साथ।”
ग्रेहम रास्ते भर उलझन में पड़ा रहा, अपने को कोसता रहा। काश, मैंने पहले ही सैली से बात की होती! एक-एक पल भारी हो रहा था। पहुंचते ही सैली ने नर्स से पूछा, ”क्या वह अनिला के कमरे में जा सकती है?”
नर्स ने बताया, ”नीम-बेहोशी है।”
ग्रेहम ने आगे बढ़कर अनिला का हाथ अपने हाथ में ले लिया। अनिला ने आंखें खोलीं, पहचाना। हाथों की पकड़ कस गई, आंखों में नमी तैर गई। कृतज्ञ निगाहों से सैली को देखा और ग्रेहम की ओर मुड़ गई।
उषा वर्मा (यू के)

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